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श्रीमद्भागवत गीता सार | geeta saar in hindi | geeta ka saar


श्रीमद्भागवत गीता सार





geeta saar in hindi - सांसारिक मोह के कारण ही मनुष्य ' मैं क्या करूं और क्या नहीं करूं ' इस दुविधा में फसकर कर्तव्यच्युत हो जाता है . अतः मोह या सुखाशक्ति के वशीभूत नहीं होना चाहिए .





शरीर नाशवान है और उसे जानने वाला शरीरी अविनाशी है- इस विवेक को महत्व देना और अपने कर्तव्य का पालन करना इन दोनों में से किसी भी एक उपायको काम में लाने से चिंता शोक मिट जाते हैं .






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निष्काम भाव पूर्वक केवल दूसरों के हित के लिए अपने कर्तव्य का तत्परता से पालन करने मात्र से कल्याण हो जाता है.
कर्म बंधन से छूटने के दो उपाए हैं- कर्मों के तत्व को जानकर नि:स्वार्थ भाव से कर्म करना और तत्वज्ञान का अनुभव करना.





मनुष्य को अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों के आने पर सुखी-दुखी नहीं होना चाहिए, क्योंकि इनसे सुखी-दुखी होने वाला मनुष्य संसार से ऊंचा उठकर परम आनंद का अनुभव नहीं कर सकता.





किसी भी साधनसे से अंतःकरण में समता आनी चाहिए समता आए बिना मनुष्य सर्वथा निर्विकार नहीं हो सकता.
सब कुछ भगवान ही है ऐसा स्वीकार कर लेना सर्वश्रेष्ठ साधन है.





अंत कालीन चिंतन के अनुसार ही जीव की गति होती है अतः मनुष्यको हर दम भगवान का स्मरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, जिससे अंत काल में भगवान की स्मृति बनी रहे.





सभी मनुष्य भगवत प्राप्ति के अधिकारी हैं, चाहे वे किसी भी वर्णाश्रम, संप्रदाय, देश, वेश आदि के क्यों न हो.
संसार में जहां भी विलक्षणता, विशेषता, सुंदरता, महत्ता विद्वता आदि दिखे उसको भगवान का ही मानकर भगवान का ही चिंतन करना चाहिए .





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इस जगत को भगवान का ही स्वरूप मानकर प्रत्येक मनुष्य भगवान के विराट स्वरूप का दर्शन कर सकता है .
जो भक्त शरीर, इंद्रियां, मन, बुद्धि सहित अपने आप को भगवान को अर्पण कर देता है, वह भगवान को प्रिय होता है.
संसार में एक परमात्मतत्व ही जानने योग्य है . उसको जानने पर अमरता की प्राप्ति हो जाती है.





संसार बंधन से छूटने के लिए सत रज और तम इन तीनों गुणों से अतीत होना जरूरी है अनन्य भक्ति से मनुष्य इन तीनों गुणों से अतीत हो जाता है.





इस संसार का मूल आधार और अत्यंत श्रेष्ठ परम पुरुष एक परमात्मा ही है ऐसा मानकर अनन्य भाव से उनका भजन करना चाहिए.
दुर्गुण दुरा चारों से ही मनुष्य 84 लाख योनियों एवं नरको में जाता है और दुख पाता है. अतः जन्म मरण के चक्र से छूटने के लिए दुर्गुण दुराचारों का त्याग करना आवश्यक है.





मनुष्य श्रद्धा पूर्वक जो भी शुभ कार्य करें उसको भगवान का स्मरण करके, उनके नाम का उच्चारण करके ही आरंभ करना चाहिए.





सब ग्रंथों का सार वेद है, वेदों का सार उपनिषद है, उपनिषदों का सार गीता है और गीता का सार भगवान की शरणागति है जो अनन्य भाव से भगवान की शरण हो जाता है, उसे भगवान संपूर्ण पापों से मुक्त कर देते हैं .
जय श्री कृष्णा


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