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रविवार व्रत कथा एवं पूजन विधि | रविवार की आरती | Ravivar vrat katha

Ravivar vrat katha :- सर्व मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु रविवार का व्रत ( Ravivar vrat ) श्रेष्ठ है । यह व्रत सर्व कार्यप्रद, कुष्ठादि रोग नाशक, पाप नाशक तथा मुक्ति प्रदायक है। इस व्रत की विधिइस प्रकार है :-

Raviwar vrat pujan vidhi :-  प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण करें तथा शांत चित्त होकर परमात्मा का स्मरण करें। भोजन एक समय से अधिक नहीं करना चाहिए। ( भोजन तथा फलाहार सूर्य के प्रकाश रहते ही कर लेना चाहिए ) । यदि निराहार रहने पर सूर्य छिप जाएं तो दूसरे दिन सूर्य उदय हो जाने पर अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करें ।
Ravivar vrat katha
Ravivar vrat katha 

रविवार व्रत कथा एवं पूजन विधि | Ravivar vrat katha 

व्रत के अंत में व्रत कथा ( Ravivar vrat katha ) सुननी चाहिए । व्रत के दिन नमकीन तेलयुक्त भोजन कदापि ग्रहण न करें । रविवार का व्रत करते हुए, 1 वर्ष बीत जाने पर व्रत करने वाला सूर्य को प्रणाम कर " कहे कि मेरे ग्रह में चलिए, मैं आपका उद्यापन करूंगा " ।

इतना कहकर माशाभर की भगवान सूर्य की स्वर्ण की मूर्ती बनवाकर पंचरत्न सहित बिना छिद्र का कलश स्थापित करके, उसके ऊपर चावल से पूर्ण तांबे का पात्र रखें और लाल वस्त्र से उसे आच्छादित करके पुष्प मालाओं से वेष्टित करें। तत्पश्चात सूर्य के 12 नामों से सूर्य का पूजन करें, नारियल का अर्घ्य दें । इस व्रत के करने से मान सम्मान बढ़ता है तथा शत्रुओं का क्षय होता है। आंख की पीड़ा के अतिरिक्त अन्य सब पीड़ाएँ दूर होती हैं।
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रविवार व्रत कथा | Ravivar vrat katha 

रविवार व्रत कथा  :- एक बुढ़िया थी। उसका नियम था कि प्रति रविवार (Ravivar) को ही स्नान आदि कर घर को गोबर से लीप कर फिर भोजन तैयार कर भगवान को भोग लगाकर वह स्वयं भोजन करती थी। ऐसा व्रत करने से उसका घर अनेक प्रकार के धन-धान्य से पूर्ण था।

श्री हरि की कृपा से घर में किसी प्रकार का विघ्न या दुख नहीं था। सब प्रकार से घर में आनंद रहता था। इस प्रकार दिन बीत जाने पर उसकी एक पड़ोसन जिसकी गौ का गोबर वह बुढ़िया लाया करती थी । उसे सब प्रकार से सुखी देखकर वह उससे जला करती थी।

वह विचार करने लगी कि वह वृद्धा सर्वदा मेरी गौ का गोबर ले जाती है और उससे अपने घर को लीप पोतकर भगवान की पूजा करती है और भोग लगती है अतः बुढ़िया को अब अपनी गौ का गोबर नहीं लेने देना चाहिए । यह सोचकर वह अपनी गौ को घर के भीतर बांधने लग गई।

रविवार व्रत कथा एवं पूजन विधि | रविवार की आरती | Ravivar vrat katha 

बुड़िया गोबर न मिलने से रविवार के दिन अपने घर को न लीप सकी। इसलिए उसने न तो भोजन बनाया ना भगवान को भोग लगाया तथा स्वयं भी उसने भोजन नहीं किया। इस प्रकार उसने निराहार व्रत (ravivar vrat katha ) किया । रात्रि हो गई और वह भूखी ही सो गई । रात्रि में भगवान ने उसे स्वप्न दिया और भोजन न बनाने तथा भोग न लगाने का कारण पूछा। वृद्धा ने गोबर न मिलने का कारण सुनाया । तब भगवान ने कहा कि माता हम तुमको ऐसी गौ देते हैं, जिससे सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं । क्योंकि तुम हमेशा रविवार को गौ के गोबर से लीप कर भोजन बनाकर मेरा भोग लगाकर खुद भोजन करती हो ।

सूर्य उपासना व्रत कथा | Ravivar sury upasna vrat katha 

इससे में प्रसन्न होकर तुम को वरदान देता हूं। मैं निर्धन को धन और बांझ स्त्रियों को पुत्र देकर उनके दुखों को दूर करता हूं तथा अंत समय में मोक्ष प्रदान करता हूं। स्वप्न में ऐसा वरदान देकर भगवान तो अंतर्धान हो गए और वृद्धा की आंख खुली तो वह देखती है कि में एक अति सुंदर और उसका बछड़ा बंधे हुए हैं। वह गाय और बछड़े को देखकर अति प्रसन्न हुई और उसने उन्हें घर के बाहर बांध दिया

और वहीं खाने को चारा डाल दिया । जब उसकी पड़ोसन बुढ़िया ने घर के बाहर एक अति सुंदर और बछड़े को देखा तो द्वेष के कारण उसका हृदय जल उठा और उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर किया है वह उस गाय का गोबर ले गई और अपनी गाय का गोबर उसकी जगह पर रख गई। वह नित्य प्रति ऐसा ही करती रही । बुड़िया को इसकी भनक भी नहीं पड़ने दी ।

रविवार व्रत सम्पूर्ण व्रत कथा एवं पूजन विधि | Ravivar vrat katha 

तब सर्वव्यापी ईश्वर ने सोचा कि चालाक पड़ोसन के कर्म से बुड़िया ठगी जा रही है तो ईश्वर ने संध्या के समय अपनी माया से बड़े जोर की आंधी चला चला दी । (ravivar vrat katha ) बुढ़िया ने आंधी के भय से अपनी गौ और बछड़े को भीतर बांध लिया।
प्रातः काल जब वृद्धा ने देखा कि गौ ने सोने का गोबर दिया है तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही और वह प्रतिदिन गऊ को घर के भीतर बांधने लगी उधर पड़ोसन ने देखा की बुढ़िया गौ को घर के भीतर बांधने लगी ।

तो उसका सोने का गोबर उठाने का दाव नहीं चलता तो वह ईर्ष्या और डाह से जल उठी और कुछ उपाय न देख पड़ोसन ने उस देश के राजा की सभा में जाकर कहा महाराज मेरे पड़ोस की एक वृद्धा के पास एक ऐसी गौ है जो आप जैसे राजाओं के ही योग्य है, वह नित्य सोने का गोबर देती है । आप उस सोने से प्रजा का पालन करिए । वह वृद्धा इतने सोने का क्या करेगी? राजा ने यह बात सुन अपने दूतों को वृद्धा के घर से गौ लाने की आज्ञा दी ।

sampurn ravivar vrat katha

वृद्धा प्रातः ईश्वर का भोग लगा भोजन ग्रहण करने ही जा रही थी कि राजा के कर्मचारी गौ को खोल कर ले गय। बो काफी रोई चिल्लाई किंतु राजा के कर्मचारियों के समक्ष कोई क्या कहता । उस दिन वृद्धा गौ के वियोग में भोजन न खा सकी और रात भर रो-रो कर ईश्वर से गौ को पुनः पाने के लिए प्रार्थना करती रही।

उधर राजा गौ को देखकर प्रसन्न हुआ, लेकिन सुबह जैसे ही वह उठा सारा महल गोबर से भरा दिखाई देने लगा । राजा यह देख घबरा गया । भगवान ने रात्रि में राजा को सपने में कहां की है राजा !गौ वृद्धा को लौटाने में ही तेरा भला है ।

उसके रविवार के व्रत ( ravivar vrat katha ) से प्रसन्न होकर मैंने उसे गाय दी थी । प्रातः होते ही राजा ने वृद्धा को बुलाकर बहुत से धन के साथ सम्मान सहित गौ लौटा दी तथा उसकी पड़ोसन को बुलाकर उचित दंड दिया ।

इतना करने के बाद राजा के महल से गंदगी दूर हुई। उसी दिन से राजा ने नगरवासियों को आदेश दिया कि राज्य की तथा अपनी समस्त मनोकामनाओ की पूर्ति के लिए रविवार का व्रत रखा करो

व्रत करने से लोग सुखी जीवन व्यतीत करने लगे कोई भी घातक रोग प्रकृति का प्रकोप उस नगर पर नहीं होता था ।सारी प्रजा सुख से रहने लगी ।जो मनुष्य रविवार के व्रत (ravivar vrat katha ) को करता है वह निसर्याधि निपुण, स्त्री पुत्र एवं पौत्र से युक्त होता है। पृथ्वी पर देवताओं के दुर्लभ भोगो को भोगकर कर अंत में मोक्ष प्राप्त करके सूर्यलोक का गमन करता है।
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रविवार की आरती ( ravivar ki aarti )

कहं लगि आरती दास करेंगे, सकल जगत जाकी ज्योति विराजे ।।
सात समुद्र जाके चरणनि बसे, कहा भयो जल कुंभ भरे हो राम ।
कोटि भानु जाके नख की शोभा, कहां भयो मंदिर दीप धरे हो राम ।
भार अठारह रोमावली जाके, कहां भयो शिर पुष्प धरे हो राम।
छप्पन भोग जाके प्रतिदिन लागे, कहां भयो नैवेद्य धरे हो राम।
अमित कोटि जाके बाजा बाजे, कहां भयो झनकार करे हो राम।
चार वेद जाके मुख् की शोभा, कहां भयो ब्रह्म वेद पढ़े हो राम।
शिव सनकादिक आदि ब्रह्मादिक, नारद मुनि जो ध्यान धरे हो राम ।
हिम मन्दार जाको पवन झकोरे, कहां भयो शिर चंवर ढुरे हो राम ।
लख चौरासी बंद छुड़ाए, केवल हरियश नामदेव गाए हो राम ।।


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