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शीतला अष्टमी व्रत कथा | बसौड़ा व्रत कथा | sheetla mata ki katha

Sheetla mata ki katha pujan vidhi :- शीतला देवी की पूजा वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को की जाती है। चेचक आदि निकलने के प्रकोप से बचने के लिए शीतला माता की पूजा करने का विधान है । तथा शीतला माता की कथा ( Sheetla mata ki katha) को पड़ते तथा सुनते है ।


ऐसी मान्यता है कि जिस घर की स्त्रियां शुद्ध मन से इस व्रत को करती हैं उस घर को शीतला माता धनधान्य से पूर्ण एवं प्राकृतिक विपदा से दूर रखती हैं।यह व्रत " बसौड़ा के नाम से यह अधिक विख्यात है "। बसोड़ा का अर्थ है, "बासी भोजन " ।
 sheetla mata ki katha | shitla ashtmi vrat katha

 sheetla mata ki katha

शीतला अष्टमी व्रत कथा | बसौड़ा व्रत कथा | sheetla mata ki katha

इस दिन घर में ताजा भोजन नहीं बनाया जाता, अपितु 1 दिन पहले ही भोजन बनाकर रख दिया जाता है । माता शीतला का भोजन पूजन करने के पश्चात घर के सभी लोग बासी भोजन को ग्रहण करते हैं । जिस घर में पहले से ही कोई चेचक आदि से पीड़ित हो उसे इस व्रत को नहीं करना चाहिए ।

sheetla mata ki katha :- प्राचीन काल में एक बार एक राजा के इकलौते पुत्र को शीतला (चेचक) निकली । उसी के राज्य में एक काछी के पुत्र को भी शीतला निकली हुई थी । काछी बहुत निर्धन था। किंतु भगवती का परम उपासक था। वह धार्मिक दृष्टि से आवश्यक समझे जाने वाले सभी नियमों को बीमारी के दौरान भी भली-भांति निभाता रहा। घर में साफ सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता था। नियम से भगवती की पूजा होती थी। नमक खाने पर पाबंदी थी, दाल, सब्जी में ना तो छौक लगता था और ना ही कोई वस्तु भुनी या तली जाती थी।

काछी गर्म वस्तु ना खुद खाता था और न ही शीतला वाले पुत्र को देता था। ऐसा करने से उसका पुत्र शीघ्र ही ठीक हो गया। दूसरी ओर जब से राजा के पुत्र को शीतला का प्रकोप हुआ था, तब से उसने भगवती के मंडक में शतचंडी का पाठ करवाया हुआ था। प्रांयः हवन एवं बलिदान होते थे । राजपुरोहित भी सदा भगवती के पूजन में निमग्न रहते । राज महल में नित्य कड़ाही चढ़ती, विविध प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनते तथा मांस आदि भी पकाया जाता।

शीतला अष्टमी व्रत कथा | बसौड़ा व्रत कथा | sheetla mata ki katha

राजकुमार का मन व्यंजनों की गंध से मचल उठता। वह भोजन के लिए जिद करता। एक तो राज पुत्र और दूसरे इकलौता, इस कारण उसकी जिद पूरी कर दी जाती । इससे शीतला का प्रकोप घटने के बजाय बढ़ने लगा।शीतला के साथ साथ उसके बड़े बड़े फोड़े भी निकलने लगे, जिनमें खुजली व जलन होती थी । शीतला की शांति के निमित्त राजा जितने भी उपाय करता, शीतला का प्रकोप उतना ही बढ़ता जाता । 
इसका कारण यह था कि अज्ञानता बस राजा के यहां सभी का कार्य उल्टे हो रहे थे । पुत्र की हालत देखकर राजा और भी ज्यादा परेशान हो गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इतना सब होने के बाद भी शीतला का प्रकोप शांत क्यों नहीं हो रहा है ?

1 दिन राजा के गुप्त चारों ने उसे बताया कि काछी के पुत्र को भी शीतला निकली थी, पर वह बिल्कुल ठीक हो गया। यह जानकर राजा सोच में पड़ गया कि मैं शीतला की इतनी सेवा कर रहा हूं, पूजा व अनुष्ठान में भी कोई कमी नहीं, पर मेरा पुत्र और भी अधिक रोगी होता जा रहा है, जबकि काछी का पुत्र बिना सेवा पूजा के ही ठीक हो गया यह सब सोचते हुए वह निद्रा लीन हो गया । स्वप्न में श्वेत वस्त्र धारण भगवती ने दर्शन देकर उससे कहा हे राजन! में तेरी सेवा अर्चना से प्रसन्न हूं, इस कारण तेरा पुत्र आज भी जीवित है।

शीतला अष्टमी व्रत कथा | बसौड़ा व्रत कथा | sheetla mata ki katha

इसके ठीक न होने का कारण यह है कि तूने शीतला के समय पालन करने योग नियमों का उल्लंघन किया। तुझे ऐसी हालत में नमक का प्रयोग बंद करना चाहिए। नमक से रोगी के फोड़ों में खुजली और जलन होती है। घर की दाल सब्जियों में छौक नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि इससे रोगी का मन वस्तुओं के सेवन करने के लिए ललचता है । रोगी के पास किसी का आना और जाना मना है, क्योंकि यह रोग अन्य को भी होने का भय रहता है।

तू इन सभी नियमों का पालन कर तेरा पुत्र ठीक हो जाएगा। यह सब कह कर भगवती लोप हो गई। निद्रा से जागकर राजा ने सब बातों पर मनन किया तथा देवी की आज्ञाअनुसार सभी कार्यों की व्यवस्था कर दी। इससे राजकुमार की सेहत में सुधार होने लगा और वह कुछ ही दिनों में ठीक हो गया।

इस व्रत को करने से व्रती के कुल में दाह ज्वर, पीत ज्वर, विस्फोटक, दुर्गंध युक्त फोड़े, समस्त नेत्र रोग ,शीतला की फुंसियां के चिन्ह तथा शीतला जनित रोग दूर होते हैं एवं शीतला माता सदैव संतुष्ट रहती हैं।
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