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हलषष्ठी व्रत कथा | hal shashti vrat katha | harchat vrat katha in hindi

श्री  गणेशाय नमः अथ हलषष्ठी व्रत कथा hal shashti vrat katha एवं पूजन विधि (harchat pujan vidhi) सबसे पहले हमे मंत्रो के उच्चारणों के साथ पंचदेव की पूजा करना है

hal shashti vrat katha

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः।।
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि।।

इस मंत्र से गणेश जी को प्रणाम कर, आचमन करे, फिर संकल्प करें ( अर्थात अपना नाम गोत्र तिथि .. हलषष्ठी व्रत पूजनं करिष्ये ) ,। फिर ॐ नमः शम्भाय….. श्रीश्वात लक्ष्मीश्च…., ओं गणानान्त्वा….., य. क्रन्द्र.... इन चारो मन्त्रों को पढ़ते हुए शिव पार्वती, गणेशजी तथा भगवान देवताओं की गंध अक्षत पुष्प, धूप और नैवेद्य से पंचोपचार पूजन करें।
hal shasthi vrat

अथ हलषष्ठी व्रत कथा | hal shashti vrat katha

harchat vrat katha :- राजा युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण भगवान से कहा-हे भगवान! हे देवकीनन्दन! आपने तीनों लोकों के हित के लिए पृथ्वी पर जन्म लिया है, अतएव मुझ पर कृपा कीजिए। अपने पुत्र अभिमन्यु के मारे जाने पर सुभद्रा भी बड़ी दुखी हुई है, शौक से पीड़ित होकर वह जी नहीं सकती।

हे देव इसी प्रकार स्त्रीयों में श्रेष्ठ द्रोपदी भी अपने पांच पुत्रों के नाश होने पर दिन रात प्रतिदिन दुखी हो रही है। हे यदुकुल श्रेष्ठ! अभिमन्यु की भार्या के गर्भ की सन्तान भी अस्त्र के तेज से दग्ध हो रही थी। क्योंकि अति दुष्ट अश्वथामा ने इस गर्भ को बिल्कुल निश्तेज कर दिया (इस प्रकार) संसार में संतति के शोक से उत्थान हुआ ऐसा घोर महा दु:ख हो रहा है।

पिता अपने जन्म को तभी सफल जानता है, जब उसके पुत्र चिरंजीवी दीर्घायु और आरोग्य हों और उसकी संतति उत्तम हो। हे देवेश! उस दान या व्रत को बतलाइए जिसके करने से संतान शोक के दुःख से माता-पिता पीड़ित न हों। भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-यदि उत्तरा एक अपूर्व व्रत को करे तो उसका मृत पुत्र भी जीवित हो जाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं है।

राजा युधिष्ठिर ने तब भगवान से पूछा

  • इस व्रत की क्या विधि है?

  • इसके कौन देवता हैं?
  • किस काल में किया जाता है ?
  • और किस स्त्री ने यह व्रत किया था ?
  • जिससे यह प्रसिद्ध हुआ है?

हलषष्ठी व्रत कथा | hal shashti vrat katha | harchat vrat katha in hindi

श्रीकृष्ण भगवान ने तब कहा-सुभब्रा का एक राजा था। उसकी रानी का नाम सुवर्णा था। उसको हस्ती नाम दृसाद्ध पुत्र उत्पन्न हुआ। इसने अपने नाम पर हस्तिनापुर बसाई। यह बालक एक दिन धाय के साथ गंगाजी के तीर पर गया। जल से खेलता हुआ वह बालक बाल भाव से जल में चला गया, वहां एक मगर उसको पकड़ कर गहरे पानी में ले गया।

इस समाचार को सुनकर पुत्र दुःख से दुखी रानी सुवर्णा ने क्रोध के मारे धाय के पुत्र को जलती अग्नि में फेंक दिया और फेंकने के बाद अपने पुत्र को याद करती हुई बड़ा विलाप करने लगी। राजा भी दुःख से व्याकुल हो गया। धाय (पुत्र शोक) दुख से व्याकुल होकर जंगल में चली गई। कुशा और पलास से पूर्ण जंगल में मध्यान्ह के समय शिवजी की पूजा करने लगी। उसने वहां प्राणियों से वर्जित सुनसान मन्दिर में महादेव जी कार्तिकेय भगवान पार्वती तथा गणेश जी की पूजा की। ( शिव पंचायतन - अर्थात भगवान शिव, माता पार्वती जी , स्वामी कर्तिकेय जी, श्री गणेश जी, नन्दीस्वर का पूजन )

धाय प्रतिदिन इन देवताओं का ध्यान पूजन करती थी तथा तृण, धान्य और महवे का भोजन करती थी। उसके इस प्रकार करने से । हे युधिष्ठिर! भादो के महीने की कृष्ण पक्ष की षष्ठी को नगर में अद्भुत दर्शन हुआ। इस धाय का अति सुन्दर पुत्र भीड़ में से ( जीता) निकल आया। इस घटना को देखकर राजा रानी तथा अन्य बड़े आश्चर्यचकित हुए। धाय के पुत्र को जीवित देखकर चिन्ता से व्याकुल होकर लोगों ने तब ब्रह्मज्ञानी पण्डितों से उसका कारण पूछा।

हलषष्ठी व्रत कथा | hal shashti vrat katha | harchat vrat katha in hindi

इस समय शिवजी के अंश रूप दुर्वाशा नाम के महर्षि उनकी आज्ञा से राजा के हितोपदेश करने के लिए वहां पर आए। शिव स्वरूप, दुर्वासा ऋषि कल्याण का मनोरथ जान राजा ने आए हुए ऋषि का अर्घ इत्यादि से पूजन किया और उनको बारम्बार नमस्कार करके अपनी सेविका (अर्थात् ) धाय के पुत्र का भीड़ में से जीवित निकलने के विषय में पूछा। दुर्वासा ऋषि ने कहा-हे राजन्! जो धाय आपके भय से जंगल में चली गई है। वहां पर उसने महादेव जी, माता पार्वती कार्तिकेय भगवान तथा गणेशजी की पूजा की है।

उसी का ऐसा फल है। हे राजा! आप दोनों को भी वहीं पर आज चले जाना चाहिए वहां जाकर हे महीपाल! आप इस व्रत के महाफ़ल को ग्रहण कीजिए हे महाराज ! उन दोनों राजा रानी ने इस प्रकार भली भांति सन्तुष्ट होकर पहले ऋषि को जंगल भेजा और उनसे सब वार्ता सुनकर राजा और रानी भी उस घने जंगल में स्वयं गए। दुर्वासा इत्यादि ब्राह्मणों के साथ आनन्दपूर्वक वहां जाकर उन्होंने पलाश के वृक्ष के नीचे कुशा पर धाय को पूजा करते हुए देखा।

यह परम श्रद्धा पूर्वक चारों देव मूर्ति की पूजा कर रही थी, राजा ने धाय को आश्वासन करके उसके पुत्र से मिला दिया, तब धाय आनन्द युक्त होकर राजा को व्रत के (विषय में) सब कुछ निवेदन किया। धाय कहने लगी हे राजन! मैं आपके भय से जब यहां आई हूं वायु भोजन करती हुई शिवजी तथा पुत्रों सहित पार्वती जी का पूजन कर रही हूं आधी रात के स्वप्न में आनन्द दाता शिवजी का पार्वती के दोनों पुत्रों महित बैल पर चढ़े हुए कुश और पलाश के वृक्षों के नीचे देखा।

उन्होंने कहा तेरा पुत्र जीवित हो  तूने हम दोनों का व्रत किया है अतएव तेरा पुत्र अवश्य जीवेगा और रानी भी विधिपूर्वक इस उत्तम व्रत को करे इसमे उसका पुत्र जीवेगा और वह अनेक पुत्रवती होगी। इस व्रत की विधि ( harchat pujan vidhi )दुर्वासा ऋषि बतलायेंगे। दुर्वासा ऋषि ने कहा-हे राजन! भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की षष्ठी आने पर उस दिन नियम पृर्वक प्रातः काल स्नान करके मनुष्य व्रत को करें।

hal shashti vrat katha in hindi

क्रोध और लोभ त्यागकर इस व्रत के नियम का पालन करते हुए जब तक सम्पूर्ण करने की निमित्त जीवों की पंक्ति अर्थात् उसके मार्ग को न लांघे और मध्यान्तर के समय मित्रों के साथ पुत्र युक्त होने की मन में अभिलाषा करते हुए, पलाश और कुश के नीचे शिवजी पार्वती, गणेश तथा स्वामी कार्तिक इन चारों देवताओं की मूर्ति बनाकर नीचे लिखे मंत्रों से इनका पूजन करें और भक्ति भाव चित्त से इनका सब देवताओं का नाना प्रकार की धूप तथा उसके बाद उत्तम पुष्पों से पूजन करें।

(१) शिवजी की प्रार्थना मन्त्र का भावार्थ सौम्यरूप धारण करने वाले, पांच मुख वाले त्रिशूल धारण करने वाले तथा मदि मृगि महाकाल इत्यादि गुणों से युक्त शम्भु शिवजी को नमस्कार, (२) पार्वती की प्रार्थना के मंत्र का अर्थ शिवा, हरकान्ता, प्रकृति श्रेष्ठ हेतु, सुख और सौभाग्य दायिनी गौरी और धात्री को नमस्कार, (३) स्वामी कार्तिक की प्रार्थना के मन्त्र का अर्थ मोर पर सवारी करने वाले देवता को कौंच पत्री को विदीर्ण करने वाले, कुमार विशाल और स्कन्द को नमस्कार, (४) गणेश जी की प्रार्थना के मंत्र का अर्थ मूसे पर सवारी करने वाले देवता को, लम्बे उदर वाले सुन्दर सूंड वाले एक दन्त वाले तथा विघ्न को नाश करने वाले देवता को नमस्कार

दीपक, चन्दन, धूप तथा नाना प्रकार के नैवेद्य' से पूजन करके गाजे बाजे से ब्राह्मणों के साथ घर आवे तथा उस दिन महुवे के फूलों के साथ समां का चावल भोजन करे और भैंसका दूध, दही, मठा तथा घृत का भोजन करे। हे राजन! इस व्रत की ऐसी ही विधि है, जो मनुष्य ऐसा करता है वह पुत्र पौत्र से युक्त शीघ्र ही सुख को प्राप्त करता है, दुर्वासा ऋषि के वचन सुनकर राजा ने इस व्रत को किया तब मगर के बिल में से शीघ्र ही निकल कर राजकुमार ने माता-पिता तथा दुर्वासा ऋषि के चरणों पर गिरकर प्रणाम किया और बोलने लगा।

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इस व्रत के फल से राजा के यहां दीर्घायु बड़े पराक्रमी बलवान तथा सर्वगुण सम्पन्न अनेक पुत्र उत्पन्न हुए। उससे उसके राज्य में इति अर्थात् अति वृष्टि तथा और दुर्भिक्ष की शान्ति हुई और राजा ने अनेक वर्ष तक सुख पूर्वक राज्य किया। श्रीकृष्ण भगवान ने कहा यह व्रत करने वाली उत्तरा इसी व्रत को करे केशव भगवान के वचन को सुनकर राजा युधिष्ठिर कृतार्थ हो गए।

अश्वत्थामा से हत ( दग्ध) उत्तरा का गर्भ शीघ्र ही जीवित हो गया। इस व्रत के प्रभाव से सन्तति स्थिर हो जाती है। व्रत के करने के बाद शास्त्रोक्त रीति से विधि पूर्वक उद्यापन करे सुवर्ण, बैल, भैंस, तथा गाय ब्राह्मण को दे तथा सोने और चांदी की सुन्दर मूर्ति बनाकर वेद वेदांग में प्रवीण ब्राह्मणों के सहित इनका पूजन करे।

विधि जानने में श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने इस व्रत को उत्तरा से कराया जिससे अश्वत्थामा द्वारा नष्ट हुआ उसका गर्भ सुरक्षित हुआ। इस व्रत के प्रभाव से उत्तरा के उदर का गर्भ उसी क्षण जीवित गति मान तथा प्रसव हुआ। है राजन्! यही संसार के जनमेजय को उत्पन्न करने वाला परीक्षित नाम का राजा उत्पन्न हुआ, है राजन जो कोई इस अपूर्व व्रत को इम प्रकार से करता है, वह सम्पूर्ण पापों को त्यागकर सूर्य की महिमा को प्राप्त करता है। श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिर के सम्वाद में कुश पलाश नाम की हल षष्ठी व्रत की कथा समाप्त  हुई।
अब भगवान् शंकर की aarti की जाती है आरती के लिए निचे देखे -
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