Ticker

6/recent/ticker-posts

Header Ads Widget

कर्म क्यो करना चाहिए ? karm yog geeta gyan

karm yog geeta gyan :- कोई भी प्राणी क्षण भर के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के गुणों से विवश हो कर सब को कर्म करना ही पड़ता है। (गीता 3-5)

karm yog geeta gyan

Geeta gyan karmyog

जो कर्म तुम्हारे लिए निश्चित है, उसे करो। कर्म न करने से, कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से शरीर का स्वास्थ्य भी स्थिर नहीं रह सकता। (गीता 3-8)

यज्ञ के लिए किए हुए कर्मों को छोड़ कर दूसरे कर्म बन्धन का कारण हैं । आसक्ति या मोह को छोड़ कर कर्म करो। (गीता 9) यज्ञ से बचे हुए भाग का सेवन करने वाले पुरुष सब पापों से छूट जाते हैं। जो पुरुष केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पापी, पाप रूप भोजन करते हैं।

(गीता 13)

आसक्ति रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म करो। जो पुरुष इस भाव से कर्म करता है, वह परमात्मा को प्राप्त होता है। (गीता 19)

जिस कर्म को महान पुरुष करते हैं, साधारण पुरुष उसी का अनुकरण करते हैं। जिस बात को वे प्रमाण मानते हैं या जिस बात की वे प्रतिष्ठा करते हैं, लोग उसी के पीछे चल पड़ते हैं।

अपना कर्तव्य पालन करना श्रेष्ठ है, चाहे वह कर्तव्य, दूसरों के कर्तव्य की अपेक्षा बहुत उच्चकोटि का न हो। अपना कर्तव्य करते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देना अच्छा है। दूसरे के कर्तव्य को अपना (गीता 3-35) लेना भय का कारण है।

यज्ञ से सारे परोपकार के कार्य समझे जाते हैं। इन दो श्लोकों का अभिप्राय यह है कि जो काम अपने स्वार्थ को परे रख कर किए जाते हैं, उनको करते हुए मनुष्य स्वतन्त्र रहता है। शेष सब कार्यों के करने में वह अपने आपको स्वार्थ की जंजीरों में बांध लेता है। काम करना और कमाना मनुष्य का कर्तव्य है, परन्तु अपनी कमाई का एक भाग परोपकार में लगाना चाहिये।

जो पुरुष केवल अपने लिए कमाई करता है, वह पाप का जीवन व्यतीत करता है। २. समाज के संगठन में भिन्न-भिन्न कार्य करने की आवश्यकता होती है। एक पुरुष एक काम को कर सकता है, दूसरा दूसरे काम को। प्रत्येक को अपना कर्तव्य पालन करना चाहिये। 

निक यदि सोचे कि सेनापति का काम उत्तम है, उसे वही करना चाहिये, तो वह कार्य उससे तो हो नहीं सकेगा, अपने कर्तव्य को भी छोड़ देगा। पांव मस्तिष्क का कार्य नहीं कर सकते। उन्हें समझना चाहिये कि जीवन के लिये चलना भी उतना ही आवश्यक है, जितना विचार करना आवश्यक है। 

कर्म क्यो करना चाहिए 

१. कर्म करना आवश्यक है, 

२. कर्म निष्काम भाव से करना चाहिए,

३. जो  अपना कर्तव्य है, उसे ही सर्वोत्तम समझना चाहिये। 

प्रत्येक पुरुष अपनी प्रकृति और योग्यता के अनुसार ही उन्नति कर सकता है। इसी में उसका भला है इसी में समाज का भला है।


टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां